अमोघ / अमोघा
Amogha / Amoghaa
Amogha / Amoghā · IAST
अमोघ — जो अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचे।
व्युत्पत्ति · व्युत्पत्ति
अमोघ = अ (निषेध) + मोघ (निष्फल, व्यर्थ)
जो व्यर्थ न जाए। यह शब्द हमारे शास्त्रों में बहुतायत से प्रयुक्त — रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, नारद भक्ति सूत्र, पुराण। सुन्दर काण्ड के तीन प्रसिद्ध उद्धरण इसके प्रयोग को दर्शाते हैं।
शास्त्रीय सन्दर्भ
रामचरितमानस · Sundar Kāṇḍa 49
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
jadapi sakhā tava icchā nāhīṁ | mora darasu amogha jaga māhīṁ ||
भगवान् राम विभीषण जी से कहते हैं — 'यद्यपि तुम राज्य नहीं चाहते, फिर भी संसार में मेरा दर्शन अमोघ है — इसलिए तुम्हें यह अवश्य प्राप्त होगा।'
रामचरितमानस · Sundar Kāṇḍa 17
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
aba kṛtakṛtya bhayauṁ maiṁ mātā | āsiṣa tava amogha bikhyātā ||
हनुमान् जी अशोक वाटिका में माता सीता से — 'अब मैं कृतकृत्य हो गया, माता। आपका आशीर्वाद अमोघ रूप में विख्यात है।'
रामचरितमानस · Sundar Kāṇḍa 1
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
jimi amogha raghupati kara bānā | ehī bhāṁti caleu hanumānā ||
तुलसीदास जी — 'जिस प्रकार भगवान् राम का बाण कभी निष्फल नहीं होता, उसी प्रकार हनुमान् जी लङ्का के लिए चले — वे अपने लक्ष्य पर अवश्य पहुँचेंगे।'
स्रोत: akshara-pravaaha.com/naamaavali/amogha · CC BY-SA 4.0 · सन्दर्भ — रामचरितमानस