भाव

Bhaava

Bhāva · IAST

अन्तर का भाव; मन की सच्ची अनुभूति।

बालकधनु1 शास्त्रीय सन्दर्भ

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भगवद् गीता · 3.11

    देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥

    devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ । parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ॥

    इस यज्ञ से तुम देवताओं को सन्तुष्ट करो, और देवता तुम्हें समृद्ध करें। एक-दूसरे को बढ़ाते हुए तुम परम कल्याण को पाओगे।

स्रोत: akshara-pravaaha.com/naamaavali/bhava-2 · CC BY-SA 4.0 · सन्दर्भ — भगवद् गीता

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