प्रज्ञा

Prajnaa

Prajñā · IAST

गहन प्रज्ञा; स्थिर और निर्मल बुद्धि।

बालिकाकन्या1 शास्त्रीय सन्दर्भ

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भगवद् गीता · 2.57

    यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

    yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

    (श्रीकृष्ण अर्जुन से) जो सर्वत्र आसक्ति-रहित है, जो शुभ पाकर प्रसन्न नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता, उसकी बुद्धि स्थिर है।

स्रोत: akshara-pravaaha.com/naamaavali/prajna · CC BY-SA 4.0 · सन्दर्भ — भगवद् गीता

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