तृप्ति

Tripti

Tṛpti · IAST

पूर्ण तृप्ति — जहाँ कोई कमी नहीं रहती।

बालिकातुला1 शास्त्रीय सन्दर्भ

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भगवद् गीता · 3.17

    यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

    yas tv ātma-ratir eva syād ātma-tṛptaś ca mānavaḥ | ātmany eva ca santuṣṭas tasya kāryaṃ na vidyate ||

    परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला, आत्मा में ही तृप्त और आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

स्रोत: akshara-pravaaha.com/naamaavali/tripti · CC BY-SA 4.0 · सन्दर्भ — भगवद् गीता

आपकी चयन सूची 0 / 10

आपकी सूची खाली है

किसी भी नाम पर बुकमार्क दबाकर अपने पसन्द के नाम जोड़िए।