वैश्वानर

Vaishvaanara

Vaiśvānara · IAST

समस्त प्राणियों के भीतर स्थित वह दिव्य अग्नि जो अन्न को पचाती है।

बालकवृषभ1 शास्त्रीय सन्दर्भ

शास्त्रीय सन्दर्भ

  • भगवद् गीता · 15.14

    अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

    ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ dehamāśritaḥ | prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmyannaṃ caturvidham ||

    मैं वैश्वानर अग्नि बनकर सब प्राणियों के शरीर में रहता हूँ और प्राण-अपान वायु से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

स्रोत: akshara-pravaaha.com/naamaavali/vaishvanara · CC BY-SA 4.0 · सन्दर्भ — भगवद् गीता

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